Friday, April 17, 2009

सुकून

जो मुझे सुकून दे एसा जहां नहीं मिलता
जो मुझे आसरा दे एसा आशियाँ नहीं मिलता
सब्र तो कब से है हमे लेकिन
जरा भी आसमान नहीं मिलता
जिन्दगी यु ही गुजर रही है रात की तरह
हमारे जहां मे सूरज नहीं निकलता
रात भी जरा खफा सी लगती है
एक टुकडा चांद नहीं मिलता
कुछ पाने की ख्वाहिश मे सब खो रही है जिंदगी
फिसल रही है मुट्ठी में से रेत की तरह
रास्ते तो बहुत है यहाँ मगर
हमें कोई कारवां नहीं मिलता

2 comments:

Rashi said...

sahi kaha yaar......bahot sahi

vivek said...

yar mare ko nahi pata tha ki tum etna acha likh lati ho goood